Tuesday, October 6, 2020

उलझन

 दुनिया मकड़ जाल ही है,

और इंसान एक मकड़ा। अपने हिस्से का बुनता, और बड़े जाल से जकड़ा। उलझन के धागे हैं, जालों में जाले हैं, बंधन है,जकड़न है,तृष्णा है तृप्ति है। मोह है,माया है, भ्रम की जो छाया है, जीने को,बढ़ने को,बढ़ के लपकने को, धन,बल और यश का जाल बनाया है।



उम्मीद

आदमी के पाँव जब से थोड़े ठिठके हैं,

उस बगीचे में नए उम्मीद जन्मे हैं।

तितलियों की पीढ़ियों को पंख निकले हैं,

आदमी की भीड़ में अब रंग बिखरे हैं।



यह चूल्हा ज़िन्दगी का

 यह चूल्हा ज़िन्दगी का,

सोच जलाये दिमाग के चूल्हे में, वक़्त, रोटियों से गोल पकाये हैं। अनुभव के अंगारे से जलती आंच, कभी मद्धम कभी तेज सुलगती है।





Saturday, September 5, 2020

सीखो

सीख सको,सीखो वृक्षों से,
जड़ें बाँध कर उठ जाना।
नदिया की धारा से सीखो,
मीलों मील चले जाना।
सीखो नभ के तारागण से,
अनुशासन में बंध जीना।
सीखो शिक्षक की कक्षा से,
दो दो पीढ़ी को गढ़ जाना।
शिक्षक दिवस की शुभकामनायें।



आशा की तूलिका

चलो यह बस्ते, यह बोझ फेंकते हैं,
छू कर क्षितिज से कुछ कुछ पूछते हैं।
आशा की तूलिका में रंग नए लपेटे,
जीवन पटल को सुनहला कर देते हैं।




Tuesday, September 1, 2020

नन्हीं सी नैया

समंदर सी दुनिया में, छोटी सी नैया,
न पतवार कोई, न कोई खेवैया।
धारा और हवा ने दिशा एक दी है,
यात्रा समय की अजब जीवनी है।
कभी यह बढ़ा दे, कभी डगमगा दे,
धीमे से कभी कोई गीत गुनगुना दे।
गहरा है सागर, भंवर है, लहर है,
समय का है पहिया, नन्हीं सी नैया।




पथिक राष्ट्र का

आसेतु हिमाचल
अविरल, अविचल
ग्राम - नगर - गिरि
वन वन निश्छल।

पथिक राष्ट्र का बढ़ता
अनथक , उज्जवल।
सर्व समर्पित समय वेदि पर
तन,मन, धन और जीवन प्रज्वल।



मेरी माँ

भोजन टेबल पर रखा जा चुका था। नजर उठा कर देखा तो माँ सामने खड़ी थी। सूती साड़ी में लिपटी वह सादगी की प्रतिमूर्ति , चेहरा सर्द बर्फ की तरह शां...