अब तिमिर को लांघ सूरज आ चुका है,
लालिमा जग में, ह्रदय में बढ़ चली है।
खोल बाहें, कर रहे हम स्वस्ति गायन,
छाई विभा उत्सर्ग की पहली कड़ी है।
These blogs r fondest of my words, closest to my bosom, deeply enriched with the outcomes of an introspective sojourn.... The panoramic view of sinusoidal life and its adornments ....
अब तिमिर को लांघ सूरज आ चुका है,
देखो, आज की रात कितनी गहरी है,
औ' इसके साये थोड़े और भी संजीदा। हवा में पोशीदा सा एक कातिल है, देखो, सुबह किसको जगाती है ज़िंदा।पंख पूरे फैलाओ
जितना संभव हो, उतना ऊंचे जाओ नापो गगन को, विराट अम्बर को। दृष्टि भू पर बनाये रखना जो साक्षात् है उसे अपनाये रखना। सम्भावना की उड़ान में यथार्थ को बचाये रखना। पंख पूरे फैलाओहाँ। सुबह अब आ चुकी है।
धवल कांति गहरी निशा को देखो दूर करती जा रही है। किसी यज्ञ की पूर्णाहुति सा खिल रहे हैं पुष्प, हर्ष मानो कलरवों में हो रहा चहुओर है।दुनिया मकड़ जाल ही है,
और इंसान एक मकड़ा। अपने हिस्से का बुनता, और बड़े जाल से जकड़ा। उलझन के धागे हैं, जालों में जाले हैं, बंधन है,जकड़न है,तृष्णा है तृप्ति है। मोह है,माया है, भ्रम की जो छाया है, जीने को,बढ़ने को,बढ़ के लपकने को, धन,बल और यश का जाल बनाया है।आदमी के पाँव जब से थोड़े ठिठके हैं,
उस बगीचे में नए उम्मीद जन्मे हैं।
तितलियों की पीढ़ियों को पंख निकले हैं,
यह चूल्हा ज़िन्दगी का,
सोच जलाये दिमाग के चूल्हे में, वक़्त, रोटियों से गोल पकाये हैं। अनुभव के अंगारे से जलती आंच, कभी मद्धम कभी तेज सुलगती है।भोजन टेबल पर रखा जा चुका था। नजर उठा कर देखा तो माँ सामने खड़ी थी। सूती साड़ी में लिपटी वह सादगी की प्रतिमूर्ति , चेहरा सर्द बर्फ की तरह शां...