Sunday, March 22, 2020

The sinusoidal man ....

Once a cook died on-board one of my ship. He suffered an internal brain injury due to incessant rolling and pitching in heavy swells of Indian Ocean. We tried all onboard first aid measures. We diverted the ship heading to Capetown towards east London on east coast of South Africa.

South African coast guard denied helicopter evacuation and asked us to proceed towards East London. They sent a fast boat to evacuate the casualty. Unfortunately we lost the cook 1 hour before the rescue team arrived.

The team arrived and took the body away with minimal formalities. Constant communication was going on with coast guard and port control. The remaining crew was disheartened, broken. We resumed our journey towards Capetown.

Next morning we received a mail from Coastguard and SA communicable disease department that the ship stands quarantined for next 48 hours at outer waters in Capetown. The ship is restricted to make any movement beyond Capetown without approval, as the deceased person is supposed to have some infectious bacteria in his body.

All crew was directed by coastguard to take a medication for next two days and every body’s body temperature was to be logged down every 6 hrs.

The same crew who were crying and were sad for the Cook’s demise were unsettled. Some of them started cursing the lost soul. Some of them started panicking during every temp check. A chaos was building, a fear was gripping. Jokes filled with fear were getting rampant. We were awaiting some culture report of the bacteria during those 48 hrs. Weather was still furious and navigating the ship at slow steam while preventing roll and pitch was impossible.

2 days passed in this confusion and weird anticipation. People discussed their hopes, their plans, their todo lists as if things were going to end. Some were busy researching on the effects of the bacteria and possible damage to individual.

Finally a mail came from SA coastguard and NCD, your ship’s quarantine is clear and you can proceed to Capetown.

It was a relief, the same people became thankful and sober for next few days to come. Their temporal realisation had grown manifold, their needs and tantrums subsided.

Sunday, March 15, 2020

कोरोना और वैश्वीकरण 2.0

कोरोना और वैश्वीकरण 2.0 

आज इटली की गलियों में सन्नाटा है, चीन सहमी हुई हालत में अनवरत संघर्षरत है, अमेरिका स्वास्थ्य बीमा और जन स्वास्थ्य प्रणाली की आर्थिक चुनौतियों के बीच अपने लोगों को बचाने की जुगत में है, दक्षिणी कोरिया अपनी पूरी ताकत से इस महामारी से लड़ रहा है, इरान अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच उम्मीद के नए साथी ढूंढ रहा है. जी हाँ, वैश्विक महामारी कोरोना ने वैश्वीकृत 21 वी सदी के विश्व की वह दशा की है कि सभी को अपनी क्षमता, अपनी सीमा, अपनी सार्वभौमिकता के साथ इस चक्रव्यूह को पार करना है. भूमंडलीकरण के सारे प्रयोगधर्मी एक टक विश्व के देशों की भौगोलिक सीमाओं को तात्कालिक रूप से बंद होते देख रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें रद्द की जा रही है, आवागमन प्रभावित है, कांफ्रेंस और सेमिनार रद्द किये जा चुके हैं, कई देशों में लोगों का मिलना जुलना प्रतिबंधित है. 

भारत में इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया गया है, सरकार बड़ी बड़ी तैयारियां कर रही है. हर आते जाते फोन की कॉलर ट्यून जन जन को इस विभीषिका के बारे में जागृत कर रही है. कई राज्यों में स्कूल, कॉलेज, सिनेमा घर बंद किये जा चुके हैं. एक ऐसे अज्ञात से संघर्ष की तैयारी जोरों पर है, जिसका निश्चित समाधान अभी उपलब्ध नहीं है. बड़ी बड़ी कंपनियां अपने कर्मियों को घर से काम करने का विकल्प दे रही हैं. कई व्यवसाय प्रभावित हुए हैं, ख़ास कर परिवहन और पर्यटन. सोशल मीडिया की फैलती आग ने मांसाहार आधारित भोजन उद्योग को भी अनावश्यक इसके प्रभाव की जद में ला दिया है. वैज्ञानिक और स्वास्थ्य सेवा के लोग अनवरत सुरक्षा और समाधान की व्यवस्था में लगे हैं. शासन एवं प्रशासन अपनी प्रबंधन क्षमता और रणनीति के उच्चतम स्तर पर काम कर रहे हैं. भारत सरकार ने विभिन्न अन्य देशों में फंसे भारतीय नागरिकों को भी सकुशल भारत ले आने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. 

शेयर बाज़ार भी इस वैश्विक हलचल से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. विश्व के अनेक बाजारों के सूचकांकों में विगत दिनों में भारी गिरावट देखी गयी. निवेशकों में एक चिंता और घबराहट दिखी. हालांकि बाजारों के गिरने के क्रम में तात्कालिक ठहराव भी दिखा, लेकिन कमोबेश विश्व भर में निवेशकों के विश्वास में चोट पहुंची है. विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक एवं निर्यातक राष्ट्र चीन ठिठका हुआ है. उसकी अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट पहुची है. दृश्य अदृश्य संबंधों से जुड़े विश्व में चीन से शुरू हुई इस विभीषिका से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार सहमा हुआ है. मालवाहक जहाज अपने पत्तन में खड़े हैं. 

कोरोना के वैश्विक फैलाव के पीछे कहीं न कहीं भूमंडलीकरण का वह प्रयोग है जो विगत 30 वर्षों से सामाजिक - आर्थिक एवं भू राजनैतिक विकास का केंद्र रहा है. आज अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, पर्यटन, विदेशज श्रमिकों का उपयोग सहज एवं आवश्यक हो चुका है. स्थानीय मांग की हर खाई को भरने के लिए विश्व के व्यापारिक पूर्तिकर्ता तैयार है. कुछ भी असंभव नहीं रहा, इच्छाशक्ति और पूँजी ने अंतर्राष्ट्रीय समन्वय के सहयोग से अनेक शहर बसाए, अनेक नए उद्यम को दिशा दी. बड़ी पूँजी और सस्ते श्रम की खोज ने नित नए व्यापारिक सम्बन्ध सृजित किये. दुनिया "वैश्विक गाँव" बन गयी. चीन और भारत जैसे श्रम संपन्न राष्ट्र इस गाँव में महत्वपूर्ण बने. चीन के कारखानों ने जो धुंआ उगला, श्रमिकों ने जो योग्यता दिखाई, उद्यमियों ने जो हिम्मत दिखाई, उस उत्पाद को अमेज़न और अली बाबा ने दुनिया के घर घर में पंहुचा दिया. गुआनझाऊ और शंघाई अंतर्राष्ट्रीय थोक बाज़ार जैसे बन गए. 

बढ़ते मांग, बढ़ते उपभोग, बढ़ते उत्पादन को सूचना प्रोद्योगिकी ने असंभव को संभव कर सकने का हौसला दिलाया. हम दुनिया के लोग जाने - अनजाने अनदिखी डोरों से जुड़ गए. व्यापार, नवाचार और प्रोद्योगिकी के तीव्र विकास का जो उपक्रम चला, उसने कई बार अपनी गति से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय नियमन को भी स्तब्ध कर दिया. पश्चिम की पूँजी और पूरब का श्रम मिल कर इस वैश्विक गाँव की नयी दशा और दिशा बना रहे थे. विश्व के इतिहास में अर्थव्यवस्थाएं विदेशी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष निवेश के चलते इतनी करीब कभी नहीं हुई थी. 

राष्ट्र अपनी सार्वभौमिकता और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में समन्वय बैठाने के लिए सतत शोध रत रहे. इसके साथ ही प्रत्येक राष्ट्र सीमा के अन्दर और बाहर के विकास, संबंधों और प्रभावों में समन्वय बिठाने को कटिबद्ध रहे. सूचना और समाचार का पैमाना भी अब स्थानीयता और देश की सीमाओं के परे पूरा विश्व हो चुका है. पूरा विश्व एक मंच बन गया, और संबंधों के रंग बिरंगे कथानक समेटे अनेकों राष्ट्र समूह उभर आये. 
एक ओर जहाँ विकास, शोध, सम्बन्ध, विनिमय, उत्पादन, निवेश, श्रम एवं तकनीक हस्तांतरण के नित नए सोपान बने. वहीँ दूसरी ओर आतंकवाद, शोषण, दोहन, दरिद्रता, भ्रम, भय का मंच भी व्यापक हो कर अंतर्राष्ट्रीय हो गया. अस्तित्व के हाशिये पर जीवन के ज्वलंत विषय अब विश्व के सुदूर कोने में होने वाली गतिविधियों से प्रभावित होने लगे. झारखण्ड के खूंटी के किसी सुदूर गाँव में रहने वाले किसान की सामाजिक - आर्थिक दशा, दिशा और उपयोगिता को अब अमेरिका या चीन की नीतिगत गतिविधियाँ प्रभावित कर सकती हैं. वैश्विक प्रभाव और दुष्प्रभाव अब सीमाओं का मोहताज न रहा. 

इसी बीच वैश्विक महामारी "कोरोना" या "कोविद 19" ने एक बार पूरे विश्व को चकित कर दिया है. इसकी उत्पत्ति का जो भी रहस्य सामने आये, परन्तु समाधान के अभाव में कोरोना का इस वैश्विक गाँव में बढ़ता संक्रमण हमें भविष्य के विश्व के बारे में सोचने को मजबूर करता है. समाज और सरकार अथक प्रयास कर रहे हैं, आशा और प्रयास की विजय होगी, कोरोना हारेगा और मानवता जीतेगी. लेकिन यह समय हमें सोचने - समझने को बाध्य करता है, वैश्विक बाजारवाद के बीच वैश्विक आकस्मिकता और उसकी बेहतर तैयारी के लिए इशारा करता है. कहीं न कहीं यह सिद्ध करता है कि हम सही मायनों में वैश्विक गाँव नहीं बन पाए, सिर्फ वैश्विक बाज़ार बन कर रह गए. किसी मशहूर शायर की ग़ज़ल की एक पंक्ति याद आती हैं - "इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए". 

कैप्टेन कुमार देवाशीष

Wednesday, December 25, 2019

मैंने अटल को देखा है।

मैंने अटल को देखा है।

सदियों की चोटिल आकांक्षाओं,
परतंत्र पड़े मानवता की विरासत,
आसेतु हिमाचल का एकात्म लिए,
विश्व के कोलाहल को चीरते और
भारत की उपेक्षित आत्मा को सींचते।

मैंने अटल को देखा है।

सामान्य को सर्वमान्य होते हुए,
जन चैतन्य को वाणी से झकझोरते हुए,
आदर्श को पांवो से चलते, होठों से बोलते हुए,
इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम भारत के
पुनर्जागरण का नया अध्याय लिखते हुए।

मैंने अटल को देखा है।

त्याग, तपस्या और सृजन की बेकली लिए,
चित्त में मानवता, ह्रदय में माँ भारती की मूर्ति लिए,
भारत के कंकर कंकर के शंकर का आह्वान लिए,
अंत्योदय का दौर नया, राष्ट्र एकात्म को साधते,
भारत के अभिनव दर्शन को युगों का संधान देते हुए।

मैंने अटल को देखा है।

भारत के विमर्श को नया संवाद देते हुए,
‘इदं राष्ट्राय न ममः‘ को पल पल चरितार्थ करते हुए,
लाखों श्रोताओं को वाणी के पाश में बांधे,
विचारों के उत्कर्ष से साक्षात्कार कराते हुए,
भारत के धुंधलके को 21 वी सदी का दिनमान देते हुए,

मैंने अटल को देखा है।

Saturday, October 12, 2019

Universal Eye care : Is "Vision First" a reality in the state of Jharkhand.


World sight day was celebrated this year on 10th October. The fraternity working around eye sight and other stake holders conducted nationwide awareness drives with sole agenda "Vision First". Amidst the drives and concerns of sight and challenges, there were two reports which were making the scenario  worrisome. One was World report on Vision by WHO, While the other was National blindness and visual impairment survey of India 2015-19, conducted by Dr. Rajendra Prasad centre for Ophthalmic sciences, AIIMS.

There have been concerted efforts for last 30 years in eye care, still significant challenges galore. Needless to say, without vision every life function is a struggle. The world vision report by WHO reports that "Globally, at least 2.2 billion people have a vision impairment or blindness, of whom at least 1 billion have a vision impairment that could have been prevented or has yet to be addressed". The distribution of eye care related challenges are not evenly distributed across major economies of the world. The burden tends to be greater in low- and middle-income countries and underserved populations, such as women, migrants, indigenous peoples, persons with certain kinds of disability, and in rural communities. Population growth and ageing, along with behavioural and lifestyle changes, and urbanization, will dramatically increase the number of people with eye conditions, vision impairment and blindness in the coming decades. WHO proposes an Integrated people-centred eye care (IPCEC), as an approach to health system strengthening and for achieving Universal Health coverage and SDG 3: Ensure healthy lives and promote well being for all at all ages.

National blindness and visual impairment survey of India 2015-19 was conducted in order to collect evidence about the prevalent status of blindness and visual impairment in India. This survey was conducted in 31 districts of 24 states/ Union territories of India during sept 2015 to June 2018. The data was collected through house to house survey in selected districts. In Jharkhand, East Singhbhum was selected and the sample size was 3000.

The survey found a prevalence of 0.36% of blindness in all age groups. Whereas the prevalence of blindness in population more than 50 years of age was 1.99%. Major causes of blindness in population aged more than 50 years were - cataract (66.2%), Corneal opacity (7.4%), Cataract surgical complications (7.2%), Posterior segment disease (5.9%) and Glaucoma (5.5%). Whereas the major causes of visual impairment in population more than 50 years of age were - Cataract (71.2%), Refractive error (13.4%), Cataract surgical complications (5.9%).

In the population less than 50 years of age, the major causes of blindness were - Corneal opacity (37.5%), All globe/CNS abnormality (25.0%), Phthisis (12.5%), Other (25.0%). The major causes of visual impairment in this population range were - Refractive error (29.6%), Cataract (25.4%), Al globe/CNS abnormality (15.5%), Corneal opacity (14.1%).

Jharkhand's sample district East Singhbhum has reported a higher percentage of blindness and visual impairment than average. While the national average of districts regarding prevalence of blindness in population aged more than 50 years remained at 1.99%, the figure stood at 2.13% in East Singhbhum. While looking at the data collected regarding status of visual impairment in population more than 50 years of age across districts, we observe a national average of 13.76% and East Singhbhum figures standing at 16.26%.

The above average figures of East Singhbhum are alarming. It reflects that a higher percentage of population more than 50 years of age suffers from blindness or visual impairment in the district. What makes these figures more worrisome is the status of Jharkhand's lacking health infrastructure in terms of inclusion of eye care as part of universal health care. While WHO proposes an Integrated people-centred eye care (IPCEC), the State's health centres are struggling to get requisite infrastructure and Human resources. The recommended International standard for Doctor-population ratio is 1:9000, Jharkhand's public health system struggles with only 40 doctors to cater a population of more than 30 million people. Out of these 40 doctors, only 20 can do surgery. Thus the entire concept of universalization of Eye care falls in the ambit of non - govt players in the state.

This paucity of trained Eye health professionals is not going to be solved soon. At present the post graduate studies are available in only one medical college in the state. This medical college produces only 8 ophthalmologists (MS) in an year. Though the Government is taking strong steps towards capacity building of its medical colleges to produce more ophthalmologists in coming years, But till then it does not look like "Vision First" in the state of Jharkhand.




Sunday, October 6, 2019

दशरथ मांझी

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे कोई दर्द न हुआ हो। दर्द भी दिमाग से रफ्ता रफ्ता कर सिमट जाता है, दर्द और उसका अनुभव पहले पहल सिनेमा के परदे जैसा दीखता है, फिर थोड़ा छोटा हो कर टी वी जैसा, जैसे जैसे वक़्त बीतता है वह फोटो के जैसा छोटा हो जाता है।  और एक समय आता है जब वह कंप्यूटर के फोल्डर में रखे फाइल जैसा हो जाता है, फुर्सत के पलों में हम उसे क्लिक कर याद करते हैं, अपने कलेजे को को कुछ समझाते हैं, और फिर कुछ समझ बाकी रख कर ही क्लोज का बटन दबा देते हैं। पर जो भी हो दर्द तो दर्द है, और दुनिया में दर्द के मायने भी सबके अलग अलग हैं। दर्द की प्रतिक्रया और प्रबंधन भी प्रत्येक व्यक्ति का अलग अलग है। कुछ दर्द में बिखरना चुन लेते हैं, कुछ दर्द में जिद पाल लेते हैं, कुछ सिसक लेते हैं , कुछ फरियादी बन जाते हैं, कुछ तो भाग जाते हैं जिंदगी से। जो भी हो हर दर्द की अपनी दास्ताँ है। 

दूसरे का दर्द समझना सरल नहीं है। सही ही कहा गया है - जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई। अब किसी तिफ़्ल ने अगर दुनिया का दर्द समझने की कोशिश की , तो उसे पहले तो खुद उस दर्द का अनुभव होना चाहिए। वरना ईमानदार समझ बनना मुश्किल होगी। अपनी मौत का दर्द बताने के लिए कोई इंसान वापिस नहीं आया, लेकिन उसके बाद यदि देखा जाए तो अपने प्रिय की आकस्मिक मृत्यु गहरा दर्द दे जाती है। जिंदगी और मौत कभी भी इंसान के बूते से बाहर रही, और ऐसा लगता है आगे भी रहेगी। लेकिन अपने प्रिय के मृत्यु के समक्ष संभावित वियोग में सबसे कष्टकारी होता है, जब व्यक्ति प्रयास न कर पाए। जब व्यक्ति अपनी संभावनाओं की सीमा तक उसको बचाने का प्रयास न कर पाए। यही संभावनाओं की सीमा तक अपने प्रिय को बचाने का प्रकल्प ही संतोष देता है।  लेकिन सभी उतने भाग्यशाली नहीं निकलते। मृत्यु और वियोग के समक्ष यह संतोष भी सबके हिस्से नहीं आता। चिता तो मुक्त शरीर की जलती है, लेकिन उसकी अग्नि में वियोगी अस्तित्व आजीवन जलता है। 

"दशरथ मांझी" को शायद ऐसे ही जलने का प्रारब्ध लिखा था। हथोड़े की एक एक मार के साथ वह शख्स जला होगा। उनकी प्रिय पात्र पत्नी "फाल्गुनी" कराह कर आँखों के सामने दम तोड़ गयी होगी। कितना छटपटाया होगा दशरथ का ह्रदय, जब स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में फाल्गुनी ने उनकी बाहों में अंतिम सांसें गिनी होंगी। हाथों से संघर्ष और सृजन को दिशा देने वाले दशरथ के ह्रदय पर उस समय क्या बीता होगा ? कैसा होगा वह किंकर्तव्यता का भाव ? कैसे बीते होंगे ग्लानि से विह्वल उनके वह पल। कितना चिढ़ाया होगा उन्हें गहलौर के उस पहाड़ी ने। कैसे उस पहाड़ी ने उन्हें बताया होगा कि प्रारब्ध और यम के कितने स्वरुप है ?

धनबाद की कोलियरी में काम करने वाले दशरथ ने गहलौर वापिस जा कर फाल्गुनी को बिहाया होगा , तब कभी कल्पना में भी नहीं सोचा होगा कि यह पहाड़ी एक दिन फाल्गुनी का काल बनेगी। मुसहर जाति के दशरथ मांझी के जीवन में फाल्गुनी देवी की मृत्यु एक ऐसा दर्द बन कर रह गयी, जो हमेशा सिनेमा के परदे की तरह ही चलती रही होगी।  उन्होंने प्रण किया कि वह उस पहाड़ी को धराशायी करेंगे और वहाँ से औरों के लिए जीवन का मार्ग प्रशस्त करेंगे। अपने दर्द को समाज के दर्द से जोड़ कर दूसरों को उस से बचाने का प्रयत्न शायद ही कुछ बिरले करते है। दशरथ मांझी बिरले ही तो थे।

गाँव-समाज के लोग हँसते थे। पागल हो गया दशरथ। लेकिन दशरथ के हथोड़ों ने पहाड़ी पर चोट शुरू कर दी थी। यह कोई एक दिन या कुछ दिनों का प्रतिशोध नहीं रहा होगा। यह तो एक अनंत श्रद्धांजलि का प्रकल्प रहा होगा। हर हथोड़े के पीछे समानुभूति और भवितव्यता में किसी और का दर्द रहा होगा। दशरथ की आत्मा कितनी पवित्र और दृढ रही होगी, यह कल्पना से परे है। वह मार्ग बना रहा था, अपने दर्द भुला रहा था, वह चट्टान से लड़ रहा था, साथी समाज हंस रहा था। जब आप आत्मा, प्रेम और तिरोहण की इस ऊंचाई पर हों, तो लोक - लाज, हर्ष - विषाद कोई मायने नहीं रखते। दशरथ वहीँ थे, बढे चले जा रहे थे। प्रतिदिन थोड़ी दूरी कम करते, ऐसा मानो पहाड़ी के उस पार फाल्गुनी उनकी प्रतीक्षा में हों। 

जब तक गाँव के लोग उनकी बात समझते, वह काफी आगे बढ़ गए थे। अब लोग उनकी मदद कर रहे थे , कोई खाना दे जाता , कोई पानी तो कोई हथोड़ा। कैसे एक ईमानदार पहल, एक निर्लेप - निस्वार्थ पहल स्वतः जन चेतना का रूप लेती है। 22 वर्षों की अथक तपस्या से दशरथ मांझी ने पहाड़ी से रास्ता निकाल दिया, कैसे छन कर आयी होगी रौशनी उस दिन।  कैसे उम्मीदों का झरोखा बन कर तैयार हुआ होगा 22 सालों की तपस्या से। हाँ उन्होंने फाल्गुनी को कितना याद किया होगा , हर दिन , महीने, साल , हर पल। शायद यह प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा है। मानव इतिहास में यह 110 मीटर लम्बा, 8 मीटर गहरा और 9 मीटर चौड़ा मार्ग सभ्यताओं की जीवंतता का पर्याय बना रहेगा। यह रास्ता प्रेम, समर्पण, वियोग, दर्द को सृजन की दिशा देने वाला रास्ता होगा , जो 55 किलोमीटर की दूरी को 15 किलोमीटर कर देता है , कि फिर कोई फाल्गुनी इलाज़ के बिना अपने दशरथ से बिछड़ न जाए। 

दशरथ मांझी बाबा 2007 में गुजर गए। बाद में सरकार ने सुध ली और सुन्दर सड़क बनवा दी है।  उनका समाधि स्थल भी बना है। एक फिल्म भी बनी थी उन पर। आज कैप्टन उमाशंकर राय सर ने गहलौर से यह तस्वीर भेजी तो ह्रदय में कुछ लिखने की बेकली हुई। मन ने कहा कि क्या बीता होगा दशरथ मांझी पर, क्या सोचा होगा उन्होंने , कैसे 22 साल पत्थरों से लड़े होंगे। कैप्टन उमाशंकर राय सर ने तो उन्हें वहीँ सैल्यूट कर लिया, मेरी किस्मत में यह नहीं था। फिर सोचा उनके सम्मान में कुछ लिख तो सकता ही हूँ, बस लिख दिया। 




Saturday, June 29, 2019

तुम लड़ना जानते हो क्या ?


तुम लड़ना जानते हो क्या ?

क्या तुमने टूटे तारों को कभी जोड़ा है,
क्या अपने अंतर का भाव निचोड़ा है,
क्या घनघोर निःशब्द वितानों में,
अस्तित्व, उम्मीदों, सपनो के शमशानों में,
तुमने अनहद सा राग कोई छेड़ा है ?

तुमने कभी भय, भ्रम की रेखा लांघी है,
असत्य, अन्याय के गति अवरोधक बने हो?
कभी पर्वताकार अहंकारों से भिड़े हो,
या व्यवस्था के लिजलिजे दलदल में
डूबते मुर्दों के बीच जीवित बचे हो ?

क्या तुम्हारी रगों में कभी उबाल आया है,
क्या कभी तुमने चुन कर नुकसान उठाया है,
कोई दिन जिया है कभी आखिरी सोच कर?
कभी भेड़ियों के झुण्ड और झुण्ड के भेड़िये
की आँखों में तुमने अपना डर बसाया है ?

तुम लड़ना जानते हो क्या ?

-- देव --

Thursday, March 7, 2019

ईमान और कुफ्र

मैं जानता हूँ दुनिया के खेल ये सारे ,
न सफ़ेद , न स्याह कुछ रंग तुम्हारे।
ईमान क्यूँ तड़पे ,बेसुध वक़्त किनारे,
कुफ्र की बस्ती में है क्यूँ रोशन मीनारें।
काफिला ए जीस्त में यह शोर कैसा है,
रूह की बस्ती में कुछ जिबह हुआ है।
ज़िंदा लाशों की बारात चलती है ,
शहर में अब कभी न रात ढलती है।

मेरी माँ

भोजन टेबल पर रखा जा चुका था। नजर उठा कर देखा तो माँ सामने खड़ी थी। सूती साड़ी में लिपटी वह सादगी की प्रतिमूर्ति , चेहरा सर्द बर्फ की तरह शां...