Tuesday, October 6, 2020

तुझे ढूंढते हैं हर नज़र

तुझे ढूंढते हैं हर नज़र 

ऐ मेरे शहर ऐ मेरे शहर 


वो जो छिप गया वो सुकून था 

वो जो दिख रहा वो नसीब है।  


मेरी हसरतों की न फ़िक्र कर, 

अब सवाल उठते हैं वजूद पर। 


तू जख्म की न कोई बात कर, 

कोई कील ला ये सलीब है। 


मेरा मैं बिखर के सब हुआ ,

क्या अजब हुआ, क्या गजब हुआ। 


तुझे ढूंढते हैं हर नज़र 

ऐ मेरे शहर ऐ मेरे शहर 





क्षितिज

चलो यह बस्ते, यह बोझ फेंकते हैं,

दौड़ कर क्षितिज से कुछ पूछते हैं। आशा की तूलिका में रंग नए लपेटे, जीवन सूर्य को सुनहला कर देते हैं।



सीख

सीख सको,सीखो वृक्षों से,

जड़ें बाँध कर उठ जाना। नदिया की धारा से सीखो, मीलों मील चले जाना। सीखो नभ के तारागण से, अनुशासन में बंध जीना। सीखो शिक्षक की कक्षा से, दो दो पीढ़ी को गढ़ जाना। शिक्षक दिवस की शुभकामनायें।



उत्सर्ग

अब तिमिर को लांघ सूरज आ चुका है,

लालिमा जग में, ह्रदय में बढ़ चली है। खोल बाहें, कर रहे हम स्वस्ति गायन, छाई विभा उत्सर्ग की पहली कड़ी है।



गहरी रात

 देखो, आज की रात कितनी गहरी है,

औ' इसके साये थोड़े और भी संजीदा। हवा में पोशीदा सा एक कातिल है, देखो, सुबह किसको जगाती है ज़िंदा।


पंख पूरे फैलाओ

पंख पूरे फैलाओ

जितना संभव हो, उतना ऊंचे जाओ नापो गगन को, विराट अम्बर को। दृष्टि भू पर बनाये रखना जो साक्षात् है उसे अपनाये रखना। सम्भावना की उड़ान में यथार्थ को बचाये रखना। पंख पूरे फैलाओ



सुबह अब आ चुकी है

 हाँ। सुबह अब आ चुकी है।

धवल कांति गहरी निशा को देखो दूर करती जा रही है। किसी यज्ञ की पूर्णाहुति सा खिल रहे हैं पुष्प, हर्ष मानो कलरवों में हो रहा चहुओर है।




मेरी माँ

भोजन टेबल पर रखा जा चुका था। नजर उठा कर देखा तो माँ सामने खड़ी थी। सूती साड़ी में लिपटी वह सादगी की प्रतिमूर्ति , चेहरा सर्द बर्फ की तरह शां...