जीवन और जहाज,
दोनों को रुकना पडता है।
ठहरना पडता है कभी कभी।
ठहराव, रख रखाव भी जरूरी हैं।
अगले चरण के लिए नई धार भी जरूरी है।These blogs r fondest of my words, closest to my bosom, deeply enriched with the outcomes of an introspective sojourn.... The panoramic view of sinusoidal life and its adornments ....
जीवन और जहाज,
दोनों को रुकना पडता है।
ठहरना पडता है कभी कभी।
ठहराव, रख रखाव भी जरूरी हैं।
अगले चरण के लिए नई धार भी जरूरी है।आज बिरहोर समाज के साथ दिन बीता। अनेक बातें हुई। भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, कौशल, अपेक्षा, क्षमता और भी बहुत कुछ। विश्वास करना कठिन है, लेकिन 300 - 400 रुपये प्रति सप्ताह की कमाई, वह भी प्लास्टिक बोरे के रेशों से रस्सियां बुन कर। पूँजी के नाम पर लगभग शून्य, यदि कुछ है भी तो वह भी शून्य सी अवस्था में। जन धन ने खाता खुलवा दिया है, कभी कभार कुछ आता है, कहाँ से उन्हें नहीं पता। डबल राशन मिलने से गदगद हैं।
2 दशक पहले की बात है।
स्तंभ मजबूत बनाओ
जितना समय लगे, लगाओ
जीवन शून्य से पूर्ण की यात्रा है,
इसमें छोटे मार्ग न बनाओ।
हर कमजोरी, हर सुगमता,
वापस पीछे ले आएगी।
लाख अपने सर पटको,
प्रकृति छूटे पाठ पढाएगी।
जिसका सूक्ष्म सबल हो रहा,
मानो वही सफल हो रहा।
आधार की गहराईयों में,
निष्ठा के स्तंभ बनाओ।
रस है उस रसना में,
जिसने राग तुम्हारा गाया।
बेलीक, खरी बातों को,
तुमने तो नीरस पाया।
आवर्त राग के शिखर जोड़,
तुमने स्वर महल बनाए।
जो नहीं तुम्हारे मूल्य बिंदु,
उनके भी मोल चुकाए।
भावों के अगनित बिचौलियों ने,
जाने क्या क्या तुमको बेचा।
मोहित से तुम डोल रहे,
सच को न कभी तुमने सोचा।
पद, प्रभाव, धनबल वर्षा में,
लोट लोट सुख तुमने लूटा
साधु साधु, करतल गर्जन में,
मार्ग तुम्हारा कब का छूटा।
उनींदी रात में जब पूनम की चांदनी हो,
सर्द के आँचल में कोई आग लगी सी हो।
सितारे चिंगारियों से जल के जो बुझते हों,
बिखरे हुए मन के जो जज्बात सुलगते हों।
वही रात खिड़कियों पे आवाज़ लगाती है,
एक धुंध अँधेरे का और चाँद का बाती है।
बीते हुए अफसानों की बारात सजी है,
सपने भी चल रहे हैं और नींद नहीं है।
वक़्त कभी खुल कर किसी का नहीं होता,
कागज़ के पैमानों में पानी नहीं टिकता।
ख़ामोशी अब सिरहाने से शोर मचाती है,
यह रात किसी भोर से अब आँख चुराती है।
राष्ट्र उदय की चिर बेला में, शुभ संकल्प सजाते हैं हम।
तन मन धन और प्राण समर्पित, सृजन यज्ञ की पावन ज्वाला,
भारत भू की शाश्वत उन्नति, का सम गीत सुनाते हैं हम।
कल्याण भाव हो विजयी निरंतर, परमारथ का बढे पराक्रम,
वसुधा का सम्मान बढ़ाते, सृजन घोष करते जाते हम।
विजय धर्म की दिशा दिशा हो, कही रहे न कलुष निशा हो,
संकल्पों की प्रत्युषा में यह संकल्प सुनाते हैं हम।
स्वाभिमान, मर्यादित जीवन, राष्ट्र हेतु सर्वस्व समर्पण,
अभिनव युग के प्रतिमानों में भाव सनातन भर जाते हम।
शुभ संकल्प सजाते हैं हम, शुभ संकल्प सजाते हैं हम।
राष्ट्र उदय की चिर बेला में, शुभ संकल्प सजाते हैं हम।
PC- Unknown
भोजन टेबल पर रखा जा चुका था। नजर उठा कर देखा तो माँ सामने खड़ी थी। सूती साड़ी में लिपटी वह सादगी की प्रतिमूर्ति , चेहरा सर्द बर्फ की तरह शां...