Saturday, July 15, 2023

जीवन और जहाज

जीवन और जहाज,

दोनों को रुकना पडता है।

ठहरना पडता है कभी कभी।

ठहराव, रख रखाव भी जरूरी हैं।

अगले चरण के लिए नई धार भी जरूरी है।



Thursday, February 23, 2023

बिरहोर

आज बिरहोर समाज के साथ दिन बीता। अनेक बातें हुई। भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, कौशल, अपेक्षा, क्षमता और भी बहुत कुछ। विश्वास करना कठिन है, लेकिन 300 - 400 रुपये प्रति सप्ताह की कमाई, वह भी प्लास्टिक बोरे के रेशों से रस्सियां बुन कर। पूँजी के नाम पर लगभग शून्य, यदि कुछ है भी तो वह भी शून्य सी अवस्था में। जन धन ने खाता खुलवा दिया है, कभी कभार कुछ आता है, कहाँ से उन्हें नहीं पता। डबल राशन मिलने से गदगद हैं।


इनके बच्चों को स्कूल ले जाने में कठिनाई आती है। घर पर माहौल नहीं मिलता। मास्टर साब यदि कुछ पूछ बैठे तो बच्चे मौन साध लेना उचित समझते हैं। बाकी समाज अभी भी मुख्यधारा में इन्हे नहीं गिनता। भारत सरकार ने इनकी जनजाति को "विशिष्टतः असुरक्षित जनजाति समूह" में रखा है। लेकिन जनजातीय अधिकारों के विमर्श में कभी इनकी जरूरतें बुलंद करने की गलती राजनीति भी नहीं करती है।

इनकी सरलता अद्भुत है, यह शिकायत भी नहीं करते। किसी नेता, किसी अधिकारी, किसी व्यवस्था को अपने स्थिति का जिम्मेदार नहीं बताते। एक अद्भुत वर्तमान में जीते हैं यह, अतीत और संभावनाओं से उन्मुक्त। दो साथी शायद हाल में ही किसी भट्ठे से काम कर के लौटे थे। दोनों के टी शर्ट की डिज़ाइन रोचक थी। उनके साथ एक फोटो खिचाने से खुद को रोक नहीं सका।



Saturday, January 14, 2023

गंगासागर

 2 दशक पहले की बात है।

मैं कैडेट था। सुबह 4 बजे से काम करना होता था। उस सुबह जब उठा तो पता चला कि जहाज ने रात में ही गंगासागर में लंगर डाल दिया है। मुंबई के इंदिरा डॉक्स से होते हुए हमें कोलकाता के खिदिरपुर बंदरगाह जाना था। गंगा में अंतर्देशीय नौवहन के नियम ज्वार भाटा और जहाज की गहराई से जुड़े थे। यहां प्रतीक्षा सामान्य प्रक्रिया थी।
"गंगा", बचपन से यदि किसी एक संज्ञा ने अत्यधिक प्रभावित किया हो तो उसमें प्रमुख "गंगा" ही हैं। मैं रोमांचित था, रोमांच के मूल में संस्कृति, आस्था, समर्पण और अनुभव थे। कल ही तो एक फॉरवर्ड यूनियन का बंगाली वरिष्ठ सहकर्मी बता रहा था कि कैसे पुराने जमाने में गंगासागर में जहाज के लंगर डालते ही कर्मी नदी का पानी निकाल स्नान करते थे। पूंजीवाद, मशीनवाद, उसके यूनियन का वामपंथ और संस्कृति को समर्पण के अनूठे संगम को मैं चिप्पिंग करते सुन रहा था। मैं संकोच में ही रहा कि मैं क्या बताऊँ, गंगा मैया मेरे लिए क्या हैं !
सैंड हेड्स, हाँ अंग्रेज़ नाविकों ने सागर द्वीप के पास के लंगर वाले क्षेत्र को यही नाम दिया था। पूर्वी भारत में सुबह जल्दी होती है। मैं सुबह में ब्रिज पर ड्यूटी देता था। उषा की किरणें गंगासागर की जल तरंगों से मानों खेल रही थी। धवल सिकता कणों ने, सामान्यतः नील वर्णी दिखने वाले जल को भी अद्भुत धवलता में स्नात कर दिया था। और उस पर स्वर्ण बिखेरता सूरज। पूरा दृश्य ऐसा हो रहा था जैसे रंगों में उत्सर्ग की कोई प्रतिस्पर्धा चल रही हो।
मैं मौन, सूर्य को देख रहा था। मैं, समय, काल और गंगा की सागर होती धारा को देख रहा था। मैं सोच रहा था, कितने तपस्वी, कितने मनस्वी, कितने यशस्वी यहीं आ कर गंगा से सागर हो गए होंगे। सगर से ले कर बंकिम तक, वाल्मीकि से ले कर तुलसी तक, भीष्म से ले कर नरेंद्र तक, आस्था, पराक्रम और तपस्या को कूल देती गंगा यहां सागर और महासागर में सब तिरोहित कर देती हैं।
संक्रांति निकट है। गंगासागर में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी विराट समागम लगेगा। जनता जनार्दन का मेला लगेगा, बिलकुल देशज। लोग कहते हैं "सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार". अपनी उलझनों का पूरा दायित्व लेते हुए मैं फिर से मौन को चुन लेता हूँ।
PC- Unknown



Thursday, December 29, 2022

स्तंभ मजबूत बनाओ

 स्तंभ मजबूत बनाओ

जितना समय लगे, लगाओ

जीवन शून्य से पूर्ण की यात्रा है,

इसमें छोटे मार्ग न बनाओ।


हर कमजोरी, हर सुगमता, 

वापस पीछे ले आएगी।

लाख अपने सर पटको,  

प्रकृति छूटे पाठ पढाएगी। 


जिसका सूक्ष्म सबल हो रहा,

मानो वही सफल हो रहा।

आधार की गहराईयों में, 

निष्ठा के स्तंभ बनाओ।



Wednesday, December 28, 2022

नेता

रस है उस रसना में,

जिसने राग तुम्हारा गाया। 

बेलीक, खरी बातों को, 

तुमने तो नीरस पाया।


आवर्त राग के शिखर जोड़, 

तुमने स्वर महल बनाए।

जो नहीं तुम्हारे मूल्य बिंदु, 

उनके भी मोल चुकाए।


भावों के अगनित बिचौलियों ने, 

जाने क्या क्या तुमको बेचा। 

मोहित से तुम डोल रहे, 

सच को न कभी तुमने सोचा।


पद, प्रभाव, धनबल वर्षा में,


 

लोट लोट सुख तुमने लूटा

साधु साधु, करतल गर्जन में,

मार्ग तुम्हारा कब का छूटा।

Thursday, February 17, 2022

रात

उनींदी रात में जब पूनम की चांदनी हो, 

सर्द के आँचल में कोई आग लगी सी हो। 


सितारे चिंगारियों से जल के जो बुझते हों,

बिखरे हुए मन के जो जज्बात सुलगते हों।


वही रात खिड़कियों पे आवाज़ लगाती है,

एक धुंध अँधेरे का और चाँद का बाती है। 


बीते हुए अफसानों की बारात सजी है, 

सपने भी चल रहे हैं और नींद नहीं है।


वक़्त कभी खुल कर किसी का नहीं होता,

कागज़ के पैमानों में पानी नहीं टिकता। 


ख़ामोशी अब सिरहाने से शोर मचाती है, 

यह रात किसी भोर से अब आँख चुराती है। 


Tuesday, February 1, 2022

शुभ संकल्प सजाते हैं हम


शुभ संकल्प सजाते हैं हम, शुभ संकल्प सजाते हैं हम।

राष्ट्र उदय की चिर बेला में, शुभ संकल्प सजाते हैं हम।


तन मन धन और प्राण समर्पित, सृजन यज्ञ की पावन ज्वाला,

भारत भू की शाश्वत उन्नति, का सम गीत सुनाते हैं हम।


कल्याण भाव हो विजयी निरंतर, परमारथ का बढे पराक्रम,

वसुधा का सम्मान बढ़ाते, सृजन घोष करते जाते हम।


विजय धर्म की दिशा दिशा हो, कही रहे न कलुष निशा हो,

संकल्पों की प्रत्युषा में यह संकल्प सुनाते हैं हम।


स्वाभिमान, मर्यादित जीवन, राष्ट्र हेतु सर्वस्व समर्पण,

अभिनव युग के प्रतिमानों में भाव सनातन भर जाते हम।


शुभ संकल्प सजाते हैं हम, शुभ संकल्प सजाते हैं हम।

राष्ट्र उदय की चिर बेला में, शुभ संकल्प सजाते हैं हम।


PC- Unknown

मेरी माँ

भोजन टेबल पर रखा जा चुका था। नजर उठा कर देखा तो माँ सामने खड़ी थी। सूती साड़ी में लिपटी वह सादगी की प्रतिमूर्ति , चेहरा सर्द बर्फ की तरह शां...