किंकर्तव्यविमूढ!
उचित है रूकना, थोडा ठिठकना,
देखना, समझना, साहस बटोरना।
किंतु कब तक!
मोह
के जालों के बंधन में उलझा,
उलझन के दलदल में गहरे उतरता।
सोचो!
कर्म और फल क्या तुमने बनाए,
सारे जीवन फल वांछित ही पाए?
बढ़ो!
अपनी जगह किसी दूसरे को देखो,
ठिठके भ्रमित को तुम क्या कहोगे !
बढना ही जीवन है, काल से सीखो
यश का समंदर है, उतरो या डूबो।
No comments:
Post a Comment