संसार में भी रहना है और ऊंचा वाला आनंद भी चाहिए। तो बंधु आनंद की खोज में जैसे जैसे अपने अंदर जाओगे वैसे वैसे तुम्हें सामाजिक जीवंतता के लिए अभिनय सीखना होगा। अंततः यह संसार एक प्रहसन ही तो है। आत्मा और अस्तित्व का, ध्यान रहे काल की यवनिका आत्मा और अस्तित्व के प्रत्येक परिहास को देखेगी। फिर भी धीरे धीरे एक दिन सब एक हो जाएगा। जो चलता है उसे चलने दो, यात्रा ही तो है।

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